कैसे हर स्टेशन पर Photographer का कैमरा संभालते रहे Rajiv Gandhi

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कहा जाता है कि एक इंसान अच्छा है या बुरा यह जानने के लिए यह मत देखिए कि वह क्या बोलता है, बल्कि यह देखिए कि वह क्या करता है, कैसे पेश आता है, उसका रवैया क्या है. राजीव गांधी के जन्मदिन पर उन्हें ऐसे ही जानने की कोशिश करते हैं. एक फोटोग्राफर के तौर पर जगदीश यादव उनके साथ उस यात्रा के अनुभव को साझा करते हैं, जिसमें वह राजीव गांधी के साथ अपने आत्मीय बन चुके रिश्ते की बात करते हैं. राजीव जी चुनाव हार गए थे. जनता दल के विश्वनाथ प्रताप यानी वीपी सिंह प्रधानमंत्री बन गये थे. गांधी ने इसके बाद उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों की पैसेंजर ट्रेन से यात्रा की. उत्तर प्रदेश की यात्रा के दौरान जगदीश यादव भी उन्हें कवर करने के लिए उनके साथ थे. उस समय आरक्षण आंदोलन से प्रदेश की राजनीति गर्म थी. राजीव गांधी एक पैसेंजर ट्रेन से जो कि हर प्लेटफार्म पर रुकती थी उत्तर प्रदेश और बिहार की यात्रा पर निकले थे. वह एक छोटे माइक सिस्टम के जरिए हर प्लेटफार्म पर पहले से इंतजार कर रहे लोगों को संबोधित करते थे. एक नेता का इस तरह आम आदमी की तरह जनता से सीधे कनेक्ट होना उस समय एक नई बात थी. यादव कहते हैं, ‘जब ट्रेन चलने को होती थी तो वह अपनी सीट पर आकर वापस बैठ जाते थे और उनके साथ मैं भी बैठ जाता था. अगले प्लेटफार्म के लिए जब ट्रेन रुकने को होती थी तो दो लोग दौड़ते थे आगे-आगे मैं और पीछे-पीछे राजीव गांधी.

जगदीश बताते हैं कि उन दिनों वह आनंद बाजार ग्रुप में काम कर रहे थे और टेलीग्राफ को इन तस्वीरों की जरूरत थी.’ उन्होंने बताया कि जब ट्रेन धीमी होने लगती तभी मैं कूद जाता था ये क्रम चलता रहा. वह बताते हैं कि इस दौरान जो सबसे दिलचस्प बात हुई वह यह कि अगला स्टेशन आने से पहले जब ट्रेन धीमी हुई, और मैंने फिर कूदने की कोशिश की तो राजीव ने मुझे गेट पर रोक लिया और कहा, ‘देखिए इस तरह आप ट्रेन से बार-बार कूद रहे हैं मुझे भय लगता है कि आपके हाथ-पैर में चोट लग सकती है. आप ऐसा करें आप खाली हाथ कूदा करें, कैमरा मुझे पकड़ा दिया करें, जब आप कूद जाएंगे, सुरक्षित प्लेटफार्म पर खड़े हो जाएंगे तो मैं कैमरा आपको पकड़ा दिया करूंगा.’ जगदीश बताते हैं कि और वह आगे के प्लेटफार्मों के लिए ऐसा करना शुरू कर दिया और मेरा इस तरह ख्याल करने लगे. ‘वह कहते हैं, ‘इतने ऊंचे ओहदे पर रहते हुए उनका इस तरह केयरिंग होना, ध्यान रखना ओ भी एक फोटोग्राफर का जो कि मेरे जेहन में हमेशा के लिए बैठ गया.’ उन्होने कहा कि वह कई स्टेशनों तक मुझे इसी तरह कैमरा पकड़ाते रहे और मैं शूट करता रहा. जगदीश बताते हैं कि उन्होंने जाते-जाते वादा किया था कि, ‘वह एक बार जरूर मिलेंगे, तस्वीरें देखेंगे कि कैसी आपने खींची हैं.’ मैंने भी कहा कि आप भी अपनी शूट की हुई तस्वीरें दिखाइएगा क्योंकि सुना है आप भी तस्वीरें बहुत अच्छी शूट करते हैं. उन्होंने कहा बिलकुल दिखाएंगे. यादव कहते हैं लेकिन दुर्भाग्य यह कि उसी साल चंद्रशेखर के इस्तीफा देने के बाद जब लोकसभा का चुनाव आया तो चुनाव प्रचार के दौरान वह मारे गए, जिसका मुझे बहुत दुख है और मैं उनसे नहीं मिल सका. इसका मुझे आज तक मलाल है

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